प्रत्यक्षा

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कई बार कल्पनायें पँख पसारती हैं…..शब्द जो टँगे हैं हवाओं में, आ जाते हैं गिरफ्त में….कोई आकार, कोई रंग ले लेते हैं खुद बखुद…. और ..कोई रेशमी सपना फिसल जाता है आँखों के भीतर….अचानक , ऐसे ही

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